Saturday, May 16, 2020

जहन्नुम से निजात दिलाता है रमज़ान का तीसरा अशरा : मौलाना इरशाद


गोण्डा 16 मई। रमजान - उल - मुबारक का तीसरा अशरा गुनेहगारों को रमजान  के रोजे की बरकत से जहन्नुम से निजात दिलाता है। रमजान के इस तीसरे अशरे को आग से आजादी का अशरा भी कहते हैं।
मुगलजोत के  मदरसा कुल्लियतुल कुरआन के मौलाना इरशाद अहमद ने कहा कि वैसे तो रमज़ान का हर दिन और रात रहमतों से भरा हुआ होता है। पर तीसरे अशरे में अल्लाह- रब्बुल - इज्जत की ओर से अपने इबादत गुजार बन्दों के लिए खास रहमत की भी व्यवस्था की गई है। उन्होंने कहा कि बन्दे अगर पहले और दूसरे अशरे की रहमतों से  किसी वजह से महरुम रहजाते है।तीसरे अशरे में उनकेभी गुनाहों की मगफिरत होजाती है। मौलाना ने कहा कि बन्दे अगर अपने गुनाहों के लिए तीसरे अशरे में माफी की तलब करते हैं तो खुदा इस अशरे की बरकत से उनको भी जहन्नुम की आग से आजाद करदेता है। यानी उन सभी गुनेहगारों की माफ करदेता है।
खोरहंसा बाजार के छोटी मस्जिद के इमाम हाफिज मोहम्मद हारुन ने बताया कि रमजान में तीसरे अशरे का एक खास मकाम है। खुदा ने अपने पाक किताब कुरआन को इसी माह में उतारा है। उन्होंने कहा कि इस अशरे की ताक रातों 21, 23, 25, 27 व 29 में से कोई एक रात लैलतुल कद्र की होती। इस  एक रात की इबादत का सवाब हजार रातों की इबादत से भी बेहतर होता है। उन्होंने कहा कि बन्दों को चाहिए कि आखरी अशरे की ताक रातों में इस बाबरकत रात की तलाश कर खुदा से अपने गुनाहो से माफी मांगें और खुदा के रहमत - व - बरकत को पासकें । तीसरे अशरे में ही रमजान का आखरी जुमा पढ़ता है जिसे जुमेतुल - विदा या अल - विदा कहा जाता है।रमजान उल मुबारक के इस आखरी अशरे में ही ज़कात व फितरा निकाला जाता है।गरीबों की मदद की जाती है। जिससे  गरीब आदमी भी खुशी के साथ ईद मना सके।उन्होंने कहा कि रमजान का पूरा महीना ही इंसान को इंसानियत के रास्ते पर लेजाता है। लोगों के भूंख - प्यास व दुख - तकलीफ का एहसास कराता है। रमजान का रोजा शरीर के हर हिस्से व नफ्स का रोजा होता है।


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