Sunday, March 8, 2026

बाबूपुरवा की गलियों से बुर्ज ख़लीफ़ा तक: डॉ. शाज़िया तसनीम सिद्दीकी की प्रेरणादायक उड़ान



महिला दिवस के उपलक्ष्य मे नेक्स्ट मीडिया की खास पेशकश आइए आपको मिलवाते है भारत की एक जांबाज बुलंद हौसलों वाली देश की बेटी से ....

कानपुर: कानपुर के बाबूपुरवा की रहने वाली संघर्षशील डॉ. शाज़िया तसनीम सिद्दीकी आज नारी सशक्तिकरण की एक मजबूत पहचान बन चुकी हैं। अपने अदम्य हौसले, अथक मेहनत और मजबूत इरादों के दम पर उन्होंने वह मुकाम हासिल किया है, जो आज की युवा पीढ़ी—खासतौर पर बेटियों—के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने अपनी पहचान दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज ख़लीफ़ा तक पहुंचा दी।
डॉ. शाज़िया का सफर बिल्कुल आसान नहीं था। उनके पिता मो. वसीम सिद्दीकी बाबूपुरवा में एक छोटा सा होटल चलाते थे। परिवार में तीन बहनें और दो भाई होने के कारण आर्थिक स्थिति कमजोर थी, जिसके चलते उनकी पढ़ाई बीच में ही रुक गई।
लेकिन मुश्किल हालात भी उनके हौसले को झुका नहीं सके। उन्होंने दोबारा हिम्मत जुटाई और मदरसा तथा हलीम कॉलेज में दाखिला लेकर अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की। संसाधनों की कमी और सामाजिक विरोध जैसी कई बाधाएँ सामने आईं, मगर उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
साल 2013 में सरकार से मिला एक लैपटॉप उनकी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ उसी के सहारे उन्होंने अपनी एक प्लेसमेंट एजेंसी बनाई ओर अपने सुनहरे करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ती चली गईं।
कठिनाइयों के बीच भी उन्होंने अपने सपनों को जिंदा रखा। सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता में मिले एक उपहार स्वरूप मोबाइल खराब हो जाने के बावजूद भी ओर हालात सही होने तक काफी समय तक उसी मोबाईल को साथ रखा लेकिन डॉ० शाजिया ने कभी हिम्मत नहीं हारी। पिता के हौसले और अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के सहारे उन्होंने हर चुनौती को पार किया।
बाद में दुबई से मिले अवसर ने उनके सपनों को नई उड़ान दी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर काम करना शुरू किया और आज उनका दफ्तर बुर्ज ख़लीफ़ा में स्थापित है। उनका ग्रुप संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मंचों और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर वैश्विक शांति और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में कार्य कर रहा है।
इतना ही नहीं, उनके नाम से जालना (महाराष्ट्र) में एक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के निर्माण का कार्य भी प्रगति पर है।
डॉ. शाज़िया तसनीम सिद्दीकी की कहानी यह साबित करती है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो बाबूपुरवा की गलियों से निकलकर भी बुर्ज ख़लीफ़ा तक पहुंचा जा सकता है।
यह सिर्फ एक महिला की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि नारी शक्ति, हौसले और आत्मविश्वास की जीती-जागती मिसाल है।
जब हौसले हों बुलंद, तो मंज़िल कभी दूर नहीं होती
कभी लक्ष्मीबाई,
कभी बेगम हजरत महल,
कभी कल्पना चावला,
और आज डॉ. शाज़िया—
हर रूप में नारी ही शक्ति की पहचान है।।
नारी शक्ति को सलाम!!

(रिपोर्ट: सुहेल वारसी)

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