"हमारी बगल में जो अकेला आदमी रहता है, वो बाहर से कितना ही सख़्त क्यों ना दिख रहा हो लेकिन उसके अंदर कुछ और चल रहा हो सकता है. वो अंदर से कमज़ोर हो सकता है. उससे जाकर बात कीजिए, हो सकता है आपकी कोई छोटी सी बात उसे बचा ले."
मनोज बाजपेयी जब अपनी फिल्म 'भोंसले' के रोल के बारे में बता रहे थे तो लगा कि जैसे पार्क की बेंच पर बैठा आदमी आते-जाते हर व्यक्ति की ज़िंदगी पढ़ना चाह रहा हो, अंदाज़ा लगाना चाह रहा हो कि उसकी कहानी क्या है.
'भोंसले' ऐसी ही एक मराठी पुलिस वाले की कहानी है. एक बीमारी की वजह से उसे रिटायरमेंट लेने पर मजबूर कर दिया जाता है. उसे नहीं पता कि वो अब क्या करेगा. वो अंदर ही अंदर जूझ रहा है अपनी बीमारी से, अकेलेपन से, उन बुरे सपनों से जहां वो बूढ़ा है, लाचार है और कोई उसकी मदद करने नहीं आता.
इस किरदार के बारे में बात करते हुए सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर उठ रहे सवालों का ज़िक्र भी होना ही था. उनकी मौत के बाद लोगों ने उनके अकेलेपन, मानसिक प्रताड़ना और नेपोटिज़्म पर कई सवाल खड़े किए. लेकिन जब सुशांत सिंह राजपूत को लेकर उनसे सवाल पूछा तो थोड़ा असहज लगे. उनके और उनके प्रोड्यूसर संदीप कपूर के चेहरे के भाव बहुत स्पष्ट थे कि वो इस बारे में बात नहीं करना चाहते. हो सकता है कि बहुत से इंटरव्यूज़ में इन्हीं सवालों से उकता चुके हों और अब इन सवालों से आगे बढ़ना चाहते हों. उनसे पूछा कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह की प्रतिक्रिया आ रही है, उसे लेकर वे क्या कहना चाहते हैं.
"लोग जब गालियां देने लगते हैं तो संवाद के सारे रास्ते बंद कर देते हैं. गाली देना बंद करिए और सवाल पूछिए, सवाल पूछने के भी क़ायदे हैं. जितने सालों में ये गाली गलौच शुरू हुआ है, ट्रोलिंग शुरू हुई है, इससे कुछ बदला नहीं है."
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