मुज़फ़्फ़रपुर: इंसेफिलाइटिस या 'कुशासन' कौन लील रहा है मासूमों को?


सड़ते कूड़े, पसीने, फिनाइल और इंसानी लाशों की गंध में डूबे मुज़फ़्फ़रपुर के श्रीकृष्णा मेडिकल कॉलेज में इस वक़्त रात के आठ बजे हैं. पहली मंज़िल पर बने आईसीयू वार्ड के बाहर रखे जूतों की ढेर के बीच खड़ी मैं, शीशे के दरवाज़े से भीतर देखती हूं.


सारा दिन 45 डिग्री धूप की भट्टी में तपा शहर रात को भी आग उगल रहा है. हर दस मिनट में जाती बिजली और अफ़रा-तफ़री के बीच अचानक मुझे भीतर से एक चीख़ सुनाई दी.


दरवाज़े के भीतर झाँका तो पलंग का सिरा पकड़कर रो रही एक महिला नज़र आयीं. नाम सुधा, उम्र 27 साल.


अगले ही पल रोते-रोते सुधा ज़मीन पर बैठ गयीं. पलंग पर सुन्न पड़ा उनका तीन साल का बेटा रोहित एक्यूट इंसेफ़िलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से अपनी आख़िरी लड़ाई हार चुका था.


तभी अचानक अपने निर्जीव बेटे के नन्हें पैर पकड़कर सुधा ज़ोर से चीख़ीं. एक पल को मुझे लगा जैसे उनकी आवाज़ अस्पताल की दीवारों के पार पूरे शहर में गूंज रही है. डॉक्टरों के आदेश पर जब खींचकर माँ को वार्ड के बाहर ले जाया गया तब धीरे-धीरे सुधा की चीख़ें सिसकियों के एक अंतहीन सैलाब में बदल गयीं.


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